कुछ अजीब सा लगा था जब ये सोचा था की अब हम चौराहों में खड़े होकर सबसे बुरे यातायात के लिए जाने वाले शहर हमारे अपने जबलपुर में कुछ पहल करेंगे यातायात सुधारने की; पर एक बात तो यकीनन मालूम थी की हमारा शहर जिस तकलीफ कों हर पल भोगता है वो है बहुत बुरा यातायात | हर दिन अगर हमारे घर वाले घर वापस आने में देर कर देते हैं तो मन में ढेर सारी आशंकाएं जन्म लेने लगती हैं और फिर ठाना कि बस अब बहुत हुआ जब तक हमारे भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन अपने अगले पड़ाव पे नहीं आ जाता कुछ ऐसा करें जिस से हमारी संस्कारधानी जबलपुर के लिए हम कुछ कर सकें बस फिर क्या था कुछ मतवाले युवाओं ने कमर कास ली वो दिन भर अपने अपने काम करते और शाम कों तय समय में इकट्ठे होते किसी एक व्यस्ततम चौराहे में ट्रेफिक थाना प्रभारी अफसर और साथियों के साथ .... और वो हो शेर है ना कि काफिला बढ़ता गया ... बस वैसे ही एक से दो दो से चार और बड़ी अच्छी संख्या में पहुँच गया ये मुहिम | लोगो ने भी जैसे ही देखा पहले तो ठिठके रुके चौंके और फिर बोले अरे ये तो वही अन्ना जी वाले हैं वाह यार मज़ा आ गया हमारे सरे लोग बस यूँ हि कुछ ठान ले तो शहर का यातायात कभी समस्या नहीं बनेगा | कभी छोटे बच्चे सर में गांधी टोपी लगाये कार्यकर्ताओं कों देखकर मिल कर चिल्लाते अन्ना जी जिंदाबाद , कभी कोई वृद्ध जाते जाते मुस्कुराते हुए कह देता हम सुधरेंगे जग सुधरेगा कभी कोई युवती कार में बैठकर शीशे के अंदर से इशारे से पूछती ये क्या हो रहा है और जैसे हि हम बताते कि हम यातायात सुधारने में मदद कर रहे हैं एक बड़ी सी मुस्कान बिखेर देती और बड़े हि अधिकार से सर में लगी अन्ना टोपी की तरफ इशारा कर पूछती कि ये क्या है ?? और जब जवाब आता टीम अन्ना तो...अपने कार के शीशे खोल कर बड़ी ही आत्मीयता से हाथ मिलकर कहती great job sir well done ...और बड़ा चिरपरिचित जवाब उसे मिलता....... "जय हिंद " बस मुस्कराहट का दौर यूँ ही बढ़ता चला जाता और यूँ ही पूरा शहर अब मुस्कुराएगा जब यातायात एक समस्या न होकर एक सुखद अनुभूति में बदल जायेगी बस २ घंटे रोज और देखना एक नया शहर दिखेगा हमारा "अपना जबलपुर"| जय हिंद
No comments:
Post a Comment