Thursday, January 26, 2012

एक था हिमांशु ...


अरे अरे देखो पंडाल से पानी बहने लगा है कहाँ से आ रहा है ये पानी देखो तो ज़रा | ओफो  बस थोड़ी सी देर में यहाँ कीचड़ हो जायेगा और जब सारे देशभक्त यहाँ आ जायेंगे तो फिर क्या होगा ?अरे वो टेंट वाला बंदा कहाँ गया ? पंडाल में हडकंप मची हुई थी और हो भी क्यूँ ना भाई अगुस्त के महीने में इतनी बारिश और अन्ना जी का आन्दोलन स्थल पूरे तरीके से कीचड से सराबोर हो चुका था और किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था | तभी किसी ने आवाज़ दी अरे “हिमांशु” कहाँ है वही कुछ कर सकता है इतने ऊंचे पंडाल में भरे पानी का क्या करना है बुलाओ  उसे ? और बस पूरा पंडाल हिमांशु, हिमांशु, चिल्लाने लगा तभी अचानक कही दूर ऊपर से आवाज़ आती है सर, परेशान मत हों बस थोड़ी देर में ऊपर जमा पानी निकल जाएगा | सभी चौंक कर देखते हैं कि आवाज़ कहाँ से आ रही है ? है तो ये किसी अपने की ही आवाज़ ? तभी फिर से वही आवाज़ गूंजती है अरे अरे वहाँ से हट जाइए पानी आएगा ज़रा बांस दीजिए मैं इसे और ऊपर करता हूँ| सभी पलट कर देखते हैं तो पलट कर देखते ही सभी  के चेहरे में एक लंबी सी मुस्कान बरबस आ जाती है कि ज़मीन से करीब तीस फीट ऊपर शामियाने के एक डंडे कों पकड़ कर, एक हाथ से वो डंडे में संतुलन बनाये और दूसरे हाथ में एक बांस कों पकड़ कर शामियाने कों ऊपर धकेलता लटका हुआ था “हिमांशु” | और सारे बस उसकी मदद करने के लिए सब कुछ भूल कर दौड पड़ते हैं और चंद मिनिटों में वो सारा पाने जो शामियाने में जमा हो रहा था वो निकल जाता है और सारे कार्यकर्ता चैन की सांस लेते हैं और इस से पहले कि लोग उसके जज्बे की तारीफ करें “हिमांशु” फिर हर बार की तरह कहीं भीड़ में फिर गुम हो जाता है|
                           बस कुछ ऐसा ही था हिमांशु | मध्यम कद , सुगठित शरीर , बुलंद हौसलों और ऊर्जा से भरपूर २३-२४ साल का एक नौजवान जिसे अन्ना जी के आंदोलन ने राष्ट्र की डोर से ऐसा जोड़ा कि हर गली हर सड़क में जब उसके जुनूनी साथियों की प्रभात फेरी निकलती तो हिमांशु की आवाज़ सभी को रुक कर सुनने में मजबूर कर देती लोग रुकते , सुनते और हाथों कों आकाश में लहराते जोर से बोलते भारत माता की जय | हिमांशु फिर जोश से भर जाता और पूरी ताकत से फिर जुट जाता देशभक्तों के खून में उसी गर्मी का संचार करने में जिसके लिए हिमांशु जाना जाता था| कोई भूख  नहीं की उसकी फोटो कल के अखबार में आये या उसका नाम आये बस चुप चाप उस काम में जुटा रहता जिसे कुछ लोग “पागलपन” और वो “देशसेवा” कहता था |
पर क्या जादू था उस नौजवान में जो भी उस से मिलता बस उसी का होकर रह जाता | उस से मिलने के बाद आपके चेहरे में बिखर जाने वाली मुस्कान उसके जादू को बड़ी सहजता से साबित कर देती | बड़ा ही जिंदादिल, हमेशा हँसता मुस्कुराता रह्ता था वो| बस उसकी आँखे उसके दिल की गहराई का कभी कभी अंदाज़ करा देतीं पर बड़ी ही चालाकी से अपनी बातों के मायाजाल में उन्हें घुमा कर फिर निकल जाता हिमांशु और आप फिर मुस्कुरा के रह जाते | गिनीज बुक का एक रिकॉर्ड बड़ी ही कम उम्र में हासिल कर अपनी अध्मय इच्छा शक्ति का परिचय तो वो तब ही दे चुका था जब बच्चों के दूध के दांत भी नहीं टूटते और फिर उसके हौसलों कों उसने दोहराया जब “वुशु” के खेल में उसने भारत का प्रतिनिधित्व किया |
पर कभी किसी बात का दंभ नहीं किसी प्रकार का शक्ति प्रदर्शन नहीं बस शांत और सौम्य ही बनकर रहा हमेशा हिमांशु | अन्ना जी के जबलपुर संस्कारधानी के पूरे आंदोलन की जान था वो | कोई दिक्कत हो कोई परेशानी हो बस याद कीजिये उसे और आपकी दिक्कत गायब इस बात की गारंटी  होती थी जनाब |पिछले कुछ दिनों से वो आई ऐ सी जबलपुर की गतिविधियों में दिखाई कम दे रहा था जब मैंने एक दिन ओसे रास्ते में देखा तो पुछा कि कहाँ है आज कल हिमांशु दिखाई ही नहीं  देता ? तो बोला भैया बस थोड़ी दुकान की जिम्मेदारी है और भाई का हाथ बंटाने में जुटा हूँ | मैं भी उसे अपने कर्तव्य पता पर डटा देख खुश हो गया और ये कह कर विदा ली कि, तू लगा रह हिमांशु हम फिर मिलते हैं बस तैयार रह हमारे आंदोलन का अगला चरण बस शरू होने वाला है  | वो भी बड़े आदर् से पैर पड़कर चला गया और मैं भी उसे अपनी आँखों से ओझल होता देख तनिक भी अंदाज़ नहीं लगा पाया कि भविष्य किन अनिश्चितताओं के साथ हमारा परिचय करने जा रहा है |
                                 व्यस्ततम दिनचर्या और अपने कार्यालीय कार्यकलापों में व्यस्त होकर जीवन आगे बढ़ने लगा| उस दिन बहुत खुश था मैं जब अपने कॉलेज के बच्चों की एक फ्रेशर पार्टी में अपने छात्रों कों बड़े ही उत्साह और ऊर्जा के साथ भाग लेते देखा | जिस तत्परता और उत्साह के साथ बच्चों ने भाग लिया मैं मन ही मन ये सोच कर खुश होता रहा कि लगता है कि अब इन बच्चों का भविष्य सुरक्षित है और ये बहुत सफल हों जीवन में ये आशीर्वाद मन ही मन देकर मैं घर के रास्ते में निकल पड़ा तभी मेरे मोबाइल की घंटी बजी और मैंने देखा की ये फोन तो मेरे आई ऐ सी के साथी अभिलाष जी का है| मैंने बड़ी तत्परता से फोन उठाया और अपने चिरपरिचित अंदाज़ में अभिलाष जी बोले; राहुल जी जयहिन्द| अभिलाष जी  जय हिंद,  बोल कर मैं बात कों आगे बढाता किन्तु अभिलाष जी की आवाज़ में परेशानी स्पष्ट झलक रही थी उन्होंने कहा राहुल जी आपकी बात अपने किसी साथी से हुई क्या? मैंने कहा कई फोन आये तो ज़रूर थे किन्तु कार्यक्रम के दौरान मैं उन्हें नहीं उठा पाया कुछ खास है क्या अभिलाष भैया ? भय और परेशानी में डूबी हुई अभिलाष जी कि आवाज़ आई आपको हिमांशु के बारे में कुछ पता है क्या ? मैंने कहा नहीं क्यूँ? उसने आत्महत्या का प्रयास किया है और उसकी हालत बहुत चिंता जनक है | जैसे मुझे कोई सांप सूंघ गया हो अभिलाष जी की आती हुई आवाज़ सुनाई देना जैसे बंद हो गयी | पीछे सी आती कार का होर्न जैसे मेरे कान के परदे कों फाड़ने में आमादा था किन्तु मेरे ज़ेहन में तो जैसे कुछ जा ही नहीं रहा था | बस अनेको सवाल उमड़ने रहे थे | क्या, क्यूँ , कैसे , हिमांशु वही है या फिर कोई और है मैं समझ नहीं पा रहा था और बहुत सी अनिश्चितताओं के बीच तेजी से भागता हुआ मैं सीधे अस्पताल पहुंचा और बदहवास सा दौडता हुआ जब मैं हिमांशु तक आई.सी.सी.यू. में पहुंचा तो जैसे सारी आशंकाओं कों सही होता देकर और घबरा गया कि हे ईश्वर ये क्या दिखा रहा है ? ये मेरे हिमांशु कों क्या सूझ गया ? “कैसे” से ज्यादा आवश्यक लगा अब “क्या” होगा और उस सवाल के जवाब को पाने चिकित्सक की ओर पहुँचा और उसका टका सा जवाब पाकर और घबरा के रह गया | ऐसा क्या हुआ कि हिमांशु कों ये कदम उठाना पड़ा? वो योद्धा जिसपे हमेशा नाज़ था वो क्यूँ हार गया ?सारे कार्यकर्ता इकट्ठा होने लगे थे | सभी की दुआएं जुड़ने लगी और इसी लिए शायद एक दो दिन और जी लिया पर ईश्वर को जैसे बड़ी जल्दी थी कि जैसे वो कोई आंदोलन स्वर्ग में करना चाहते हों और उसके लिए हिमांशु से बेहतर व्यक्ति उन्हें नहीं मिला | नियति के क्रूर हाथों ने हमारे दिल की धडकन कों जैसे हम से छीन लिया| सारी आँखों में जैसे आंसुओं का सैलाब सा उमड़ पड़ा | और ऐसा हो भी क्यूँ ना हजारों लोगों का दुलारा अब नहीं रहा| सारे युवाओं का प्रतिनिधि , धैर्य और आत्विश्वास की पहचान अब साथ नहीं थी अगर कुछ साथ था तो बहुत से उन सुलझे सवाल , आंसुओं से नम आँखे, दर्द से फटता सिर और मुँह को आया कलेजा और इन्ही आंसुओं के बीच जैसे मन में एक ज्वाला जल रही थी कि अब कुछ ऐसा किया जाए कि कोई “हिमांशु” हम से यूँ दूर ना हो |बहुत सारे विचार एक नयी सोच को जन्म देने लगे थे | एक नयी सोच का जैसे प्रस्फुटन हो उठा था | कालिमा ने सूरज को पूरी तरह  ढँक लिया था और इन्ही सारे विचारों के साथ दर्द से फटते सिर में कब आँख लग गयी पता ही नहीं चला |
                                                     अगली सुबह थोड़ी भयानक सी लग रही थी |होती भी क्यूँ ना एक घने अंधकार के साथ घड़ी का काँटा आठ बजाने को आतुर था लीकें चरों ओर घना अन्धेरा छाया हुआ था कि जैसे “हमारे सूरज” को निगलने के बाद  ब्रह्माण्ड में जैसे कोई दूसरा अतिरिक्त सूरज जैसे बचा ही न हो परन्तु हर दुःख पर जैसे कुछ सिखाता है वैसे ही कुछ शिक्षा हमें भी दे गया कि एक शिक्षक होने के नाते हमारा दायित्व क्या है ? हम क्या करें की की हमारी आने वाली पीढ़ी कभी भी ऐसे क्रूर कदम ना उठाये ? एक अभिभावक के रूप में हमारे दायित्व क्या हैं? हम क्या करें कि फिर किसी “हिमांशु” को हमें ना खोना पड़े? बहुत सारे सवालों के जवाब में एक नया हौसला था , एक नया इरादा एक नयी सोच नया ध्येय बस “हिमांशु” तुम्हारे कारण| काश कि तुम ये समझ पाते कि तुम्हारी माँ ने क्या क्या सपने बुने थे ? पिता जी जी कि खामोशी तुम्हारे लिए प्रार्थनाओं का सबब होती थी | भाई का प्यार दिल से सच्चा था और तू तो बेटा नायक था सारे युवाओं का जो तुझे देख कर तेरे जैसा बनने के सपने पालने लगते थे | ये देश एक लंबी नींद के बाद तेरे गीत सुन कर अंगडाई लेने लगा था और उसके जागने के पहले ही “हिमांशु” तुम सो गए | कागज कि स्याही पर आँखों का पानी  टपकने लगा है और ये मेरी रचना जो हिमांशु के लिए मेरी श्रद्धांजलि है वो तनिक भी खराब न हो अतः यहीं इस लेख कि इतिश्री करना चाहता हूँ बस एक बार दिल से अपने “हिमांशु” कों कहना चाहता हूँ हम सभी तुमसे बहुत प्यार करते हैं| “हिमांशु” अब जहाँ भी हो बस खुश रहना| अलविदा दोस्त , अलविदा बेटा , अलविदा भाई , अलविदा हिमांशु.... अलविदा अलविदा अलविदा  ...............

Friday, January 6, 2012

कुछ अजीब सा लगा था जब ये सोचा था की अब हम चौराहों में खड़े होकर सबसे बुरे यातायात के लिए जाने वाले शहर हमारे अपने जबलपुर  में कुछ पहल करेंगे यातायात सुधारने की; पर एक बात तो यकीनन मालूम थी की हमारा शहर जिस तकलीफ कों हर पल भोगता है वो है बहुत बुरा यातायात | हर दिन अगर हमारे घर वाले घर वापस आने में देर कर देते हैं तो मन में ढेर सारी आशंकाएं जन्म लेने लगती हैं और फिर ठाना कि बस अब बहुत हुआ जब तक हमारे भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन अपने अगले पड़ाव पे नहीं आ जाता कुछ ऐसा करें जिस से हमारी संस्कारधानी जबलपुर के लिए हम कुछ कर सकें बस फिर क्या था कुछ मतवाले युवाओं ने कमर कास ली वो दिन भर अपने अपने काम करते और शाम कों तय समय में इकट्ठे होते किसी एक व्यस्ततम चौराहे में ट्रेफिक थाना प्रभारी अफसर और साथियों के साथ .... और वो हो शेर है ना कि काफिला बढ़ता गया ... बस वैसे ही एक से दो दो से चार और बड़ी अच्छी संख्या में पहुँच गया ये मुहिम | लोगो ने भी जैसे ही देखा पहले तो ठिठके रुके चौंके और फिर बोले अरे ये तो वही अन्ना जी वाले हैं वाह यार मज़ा आ गया हमारे सरे लोग बस यूँ हि कुछ ठान ले तो शहर का यातायात कभी समस्या नहीं बनेगा | कभी छोटे बच्चे सर में गांधी टोपी लगाये कार्यकर्ताओं कों देखकर मिल कर चिल्लाते अन्ना जी जिंदाबाद , कभी कोई वृद्ध जाते जाते मुस्कुराते हुए कह देता हम सुधरेंगे जग सुधरेगा कभी कोई युवती कार में बैठकर शीशे के अंदर से इशारे से पूछती ये क्या हो रहा है और जैसे हि हम बताते कि हम यातायात सुधारने में मदद कर रहे हैं एक बड़ी सी मुस्कान बिखेर देती और बड़े हि अधिकार से सर में लगी अन्ना टोपी की तरफ इशारा कर पूछती कि ये क्या है ?? और जब जवाब आता टीम अन्ना तो...अपने कार के शीशे खोल कर बड़ी ही आत्मीयता से हाथ मिलकर कहती great job sir well done ...और बड़ा चिरपरिचित जवाब उसे मिलता....... "जय हिंद " बस मुस्कराहट का दौर यूँ ही बढ़ता चला जाता और यूँ ही पूरा शहर अब मुस्कुराएगा जब यातायात एक समस्या न होकर एक सुखद अनुभूति में बदल जायेगी  बस २ घंटे रोज और देखना एक नया शहर दिखेगा हमारा "अपना जबलपुर"| जय हिंद 

Friday, December 9, 2011

फिर जबलपुर क़ी सड़कों में गूंजेंगे "भारत माता की जय" के नारे

संस्कारधानी जबलपुर में फिर वही राष्ट्र प्रेम की गूँज दिखाई देगी जिस गूँज ने अगस्त माह में सारे देशभक्तों को एक जुट कर दिया था | इंडिया अगेंस्ट करप्शन जबलपुर के द्वारा श्री अन्ना हजारे जी के आह्वान पर एक दिवसीय "सामूहिक अनशन" का आयोजन ११ दिसम्बर २०११ को सिविक सेण्टर स्थित जे. डी. ए. पार्क में किया गया है | भ्रष्ट होती राजनीति और राष्ट्र में हुए राष्ट्र भक्ति के अवमूल्यन से चिंतित सजग प्रहरियों ने सरकार से एक सशक्त जनलोकपाल बिल की मांग १६ अगस्त के ऐतिहासिक अनशन में की थी | संस्कारधानी जबलपुर की जनता ने भी राष्ट्र हित में बढ़ चढ़कर योगदान दिया और राष्ट्रीय पटल में जबलपुर को एक सशक्त स्थान  दिलाया था | संस्कारधानी जबलपुर , जिसे हर दिन बढ़ते अपराधों के लिए जाना जाने लगा था उसी संस्कारधानी के सजग नागरिकों ने इस आन्दोलन को भारी सफलता दिलाने में महतवपूर्ण योगदान दिया था |
                    राजनीति के जानकारों ने जबलपुर के इस ऐतिहासिक आन्दोलन की तुलना शरद यादव के आन्दोलन से भी की है | संस्कारधानी जबलपुर के युवा , वृद्ध , महिलाएँ सभी अन्ना जी के इस आन्दोलन से ओत प्रोत नज़र आये और हाथों में तिरंगे लेकर भारत माता की जयघोष करते सड़कों पर निकल आये थे | महिलाओं ने अपने घर के रोज़मर्रा के कार्यक्रमों से ज्यादा वरीयता इस आन्दोलन को दी और पूरा सिविक सेण्टर का अनशन स्थल एक राष्ट्रीय स्मारक में तब्दील हो गया था | लोग अपने प्रति दिन के कार्यक्रमों में सिविक सेण्टर के अनशन स्थल तक पहुँचने को भी जोड़ने लगे थे | कभी सारे स्वयं सेवकों के लिए कोई सुबह की चाय लेकर पहुंचता था तो कभी लोगों में उन राष्ट्रभक्तों को भोजन कराने की होड़ लगी रहती  | कभी बूढी माँ अपने अनशनकारी बेटे को देखने दिन भर गर्व से बैठी रहती तो कभी एक आधुनिका अपने नवजात बेटे को लेकर राष्ट्र भक्ति के संस्कार रोपित करने के लिए सिविक सेण्टर के अनशन स्थल में पूरा दिन गुज़ार देती थी | सभी नागरिकों की जन भावनाओं के आगे अंततः सरकार को झुकना पड़ा और एक सशक्त जन लोकपाल बिल को पेश करने का वादा कर इस ऐतिहासिक आन्दोलन को सरकार ने समाप्त करवाया |

किन्तु सरकार की जनलोकपाल के प्रति उदासीनता के कारण श्री अन्ना हजारे जी ने सभी नागरिकों से अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने का आह्वान किया और इसी कड़ी में ११ दिसम्बर २०११ रविवार को एक विशाल सामूहिक अनशन का आयोजन इंडिया अगेंस्ट करप्शन जबलपुर के द्वारा सिविक सेण्टर पार्क में आयोजित है | संस्कारधानी जबलपुर के समस्त विद्यार्थियों , नौकरी पेशा , व्यवसायी, वृद्ध  और समस्त महिलाओं से भ्रष्टाचार के विरोध में एवं सशक्त जनलोकपाल बिल के समर्थन में ११ दिसम्बर २०११ को एक दिन का सांकेतिक  अनशन कर सभी ईमानदार राष्ट्र भक्तों को सिविक सेन्टर स्थित जे. डी ए .पार्क में रविवार को सुबह ११ बजे से उपस्थित होने की अपील की है |   

Sunday, July 17, 2011

तेरे सीने में नहीं तो मेरे सीने में सही, तेरे सीने में नहीं तो मेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

  "भ्रष्टाचार क़ी भेंट चढ़े १५५५ हज़ार करोड़"

भ्रष्टाचार के काले पन्नों में एक और अध्याय जुड़ गया जब पुणे स्थित एक अत्यंत ही ज़िम्मेदार और महत्वपूर्ण संस्था "इण्डिया फोरेंसिक" ने ये खुलासा किया क़ी बीते दशक में १५५५ हज़ार करोड़ रूपए भ्रष्टाचार क़ी भेंट चढ़ गए हैं और भी ज्यादा परेशान करने वाला तथ्य ये क़ी इसमें से ज़्यादातर कमाई विदेश भेजी जा चुकी है | अपने आप में एक अनूठी रिपोर्ट "अस्सेस्तेर्निग साइज़ ऑफ़ करप्शन इन इण्डिया विथ रेस्पेक्ट तो मनी लौन्डरिंग" में बताया क़ी साल २००९ में प्रति व्यक्ति औसतन २००० रूपए क़ी घूस दी गई जो क़ी पिछले दस सालों में किसी नागरिक द्वारा इस मद में दी गई रकम का २६० गुना अधिक है | रिपोर्ट के मुताबिक बीते दशक में मनी लौन्डरिंग के तहत करीब १८८६ हज़ार करोड़ रूपए भारत से भेजे गए |

                      ऐसे कितने ही अध्याय भ्रष्टाचार के इस ग्रन्थ में अनवरत ही जुड़ते चले जायेंगे जब तक हम सभी स्वयं से इसका प्रतिकार नहीं करते| अपने कार्यों क़ी सुगमता को ध्यान में ना रख कर राष्ट्र हेतु कुछ प्रक्रियाओं कपालन में विश्वास नहीं रखते फिर वो चाहे बिना आरक्षण के रेल में यात्रा करना हो या फिर लाइसेंस बनाने के लिए बिना प्रक्रियाओं में बंधे लाइसेंस पाने का लालच | हम सभी अगर अंतिम शदों में कार्यों के निष्पादन से बचें तो अपने आप हम इन प्रक्रियाओं से हम बच सकते हैं | षडिक सहजता एवं सरलता कई बार हमें अनजाने में ही इस भ्रष्ट तंत्र का एक हिस्सा बना देती है. कहीं ना कहीं हम उसी तंत्र को मज़बूत करते जाते हैं जिसे हम नष्ट करने क़ी इच्छा रखते हैं | 

मित्रों कई बार भ्रष्टाचार के इस तंत्र को ध्वस्त करने के प्रयास अनेक देश भक्तों ने किये हैं लेकिन हमारा मूक दर्शक बन कर उन्हें ताकते रहना अपने आप उनके प्रयासों को क्षीण करता गया है जिन राष्ट्र भक्तों को देश को सर माथे में बैठना चाहिए था वो राजनैतिक षड्यंत्रों के भंवर में फंसकर शहीद हो जाते हैं और सच कहूँ तो इसके लिए वो स्वार्थी भ्रष्ट नेता ज़िम्मेदार नहीं हैं, ज़िम्मेदार हैं आप , मैं और हम सब लोग जिन्होंने हमेशा मूक दर्शक बन कर राष्ट्र हित के इन प्रयासों को कमज़ोर किया है | हम जब कभी परेशान होते हैं बढ़ती हुई  मंहगाई से हर दिन होते घोटालों से हम सिर्फ अपने ही द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों को कोसने क़ी सिवा कुछ नहीं करते | हमे मतदान के लिए जाना दुश्कर लगने लगता है और फिर जाली वोटों ,सच्चे नोटों  और हमारे इस प्रसुप्त राष्ट्र वादिता से वही लोग संसद में पहुँचते हैं जिन्हें हम वहां नहीं देखना चाहते | हम कल भी चुप थे जब अंग्रेजों ने बाहर से आकर हमें गुलाम बना लिया था और हम आज भी चुप हैं | उस वक़्त भी हम उस मसीहा को ढूंढते थे जो हमें पराधीनता क़ी बेड़ियों से मुक्ति दिलाये और हम आज भी यही कर रहें हैं किन्तु पिछली बार जब हमें वो मसीहा मिले सारा हिंदुस्तान उसके साथ हो चला था फिर चाहे वो मसीहा बापू रहें हो , सुभाष चन्द्र बोस रहे हों या वो रहे हों भगत सिंह किन्तु जब इस बार हमें जोड़ने का ज़िम्मा कुछ राष्ट्र भक्तों ने उठाया है तो हम उनका साथ देने से बेहतर घर में बैठना पसंद करतें हैं | उन प्रखर राष्ट्र भक्तों को आपका सहयोग अपेक्षित है जिस से आप , मैं हम सब और हमारी आने वाली नस्लें उस  गौरवशाली भारत को देख सकें जिसकी कल्पना हम रोज़ करतें हैं | 

                    आइये हम राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को पहचाने और जुड़ें राष्ट्र प्रेम क़ी उस अविरल धारा में जिसे देश "इण्डिया अगेंस्ट करप्शन" के रूप में जान रहा है | जाते जाते आपको दुष्यंत
 कुमार जी क़ी वो विलक्षण पंक्तियाँ समर्पित करना चाहता हूँ जो सम सामायिक है .......
                             " हो चली है पीर पर्वत सी पिघली चाहिए , अब हिमालय से भी इक गंगा निकालनी चाहिए
                                       तेरे सीने में नहीं तो मेरे सीने में सही,   तेरे सीने में नहीं तो मेरे सीने में सही, 
                                                  हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए 
                                                  सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
                                                            मेरी कोशिश है कि 
                                                         ये तस्वीर बदलनी चाहिए "

हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

  "भ्रष्टाचार क़ी भेंट चढ़े १५५५ हज़ार करोड़"

भ्रष्टाचार के काले पन्नों में एक और अध्याय जुड़ गया जब पुणे स्थित एक अत्यंत ही ज़िम्मेदार और महत्वपूर्ण संस्था "इण्डिया फोरेंसिक" ने ये खुलासा किया क़ी बीते दशक में १५५५ हज़ार करोड़ रूपए भ्रष्टाचार क़ी भेंट चढ़ गए हैं और भी ज्यादा परेशान करने वाला तथ्य ये क़ी इसमें से ज़्यादातर कमाई विदेश भेजी जा चुकी है | अपने आप में एक अनूठी रिपोर्ट "अस्सेस्तेर्निग साइज़ ऑफ़ करप्शन इन इण्डिया विथ रेस्पेक्ट तो मनी लौन्डरिंग" में बताया क़ी साल २००९ में प्रति व्यक्ति औसतन २००० रूपए क़ी घूस दी गई जो क़ी पिछले दस सालों में किसी नागरिक द्वारा इस मद में दी गई रकम का २६० गुना अधिक है | रिपोर्ट के मुताबिक बीते दशक में मनी लौन्डरिंग के तहत करीब १८८६ हज़ार करोड़ रूपए भारत से भेजे गए |

                      ऐसे कितने ही अध्याय भ्रष्टाचार के इस ग्रन्थ में अनवरत ही जुड़ते चले जायेंगे जब तक हम सभी स्वयं से इसका प्रतिकार नहीं करते| अपने कार्यों क़ी सुगमता को ध्यान में ना रख कर राष्ट्र हेतु कुछ प्रक्रियाओं कपालन में विश्वास नहीं रखते फिर वो चाहे बिना आरक्षण के रेल में यात्रा करना हो या फिर लाइसेंस बनाने के लिए बिना प्रक्रियाओं में बंधे लाइसेंस पाने का लालच | हम सभी अगर अंतिम शदों में कार्यों के निष्पादन से बचें तो अपने आप हम इन प्रक्रियाओं से हम बच सकते हैं | षडिक सहजता एवं सरलता कई बार हमें अनजाने में ही इस भ्रष्ट तंत्र का एक हिस्सा बना देती है. कहीं ना कहीं हम उसी तंत्र को मज़बूत करते जाते हैं जिसे हम नष्ट करने क़ी इच्छा रखते हैं | 

मित्रों कई बार भ्रष्टाचार के इस तंत्र को ध्वस्त करने के प्रयास अनेक देश भक्तों ने किये हैं लेकिन हमारा मूक दर्शक बन कर उन्हें ताकते रहना अपने आप उनके प्रयासों को क्षीण करता गया है जिन राष्ट्र भक्तों को देश को सर माथे में बैठना चाहिए था वो राजनैतिक षड्यंत्रों के भंवर में फंसकर शहीद हो जाते हैं और सच कहूँ तो इसके लिए वो स्वार्थी भ्रष्ट नेता ज़िम्मेदार नहीं हैं, ज़िम्मेदार हैं आप , मैं और हम सब लोग जिन्होंने हमेशा मूक दर्शक बन कर राष्ट्र हित के इन प्रयासों को कमज़ोर किया है | हम जब कभी परेशान होते हैं बढ़ती हुई  मंहगाई से हर दिन होते घोटालों से हम सिर्फ अपने ही द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों को कोसने क़ी सिवा कुछ नहीं करते | हमे मतदान के लिए जाना दुश्कर लगने लगता है और फिर जाली वोटों ,सच्चे नोटों  और हमारे इस प्रसुप्त राष्ट्र वादिता से वही लोग संसद में पहुँचते हैं जिन्हें हम वहां नहीं देखना चाहते | हम कल भी चुप थे जब अंग्रेजों ने बाहर से आकर हमें गुलाम बना लिया था और हम आज भी चुप हैं | उस वक़्त भी हम उस मसीहा को ढूंढते थे जो हमें पराधीनता क़ी बेड़ियों से मुक्ति दिलाये और हम आज भी यही कर रहें हैं किन्तु पिछली बार जब हमें वो मसीहा मिले सारा हिंदुस्तान उसके साथ हो चला था फिर चाहे वो मसीहा बापू रहें हो , सुभाष चन्द्र बोस रहे हों या वो रहे हों भगत सिंह किन्तु जब इस बार हमें जोड़ने का ज़िम्मा कुछ राष्ट्र भक्तों ने उठाया है तो हम उनका साथ देने से बेहतर घर में बैठना पसंद करतें हैं | उन प्रखर राष्ट्र भक्तों को आपका सहयोग अपेक्षित है जिस से आप , मैं हम सब और हमारी आने वाली नस्लें उस  गौरवशाली भारत को देख सकें जिसकी कल्पना हम रोज़ करतें हैं | 

                    आइये हम राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को पहचाने और जुड़ें राष्ट्र प्रेम क़ी उस अविरल धारा में जिसे देश "इण्डिया अगेंस्ट करप्शन" के रूप में जान रहा है | जाते जाते आपको दुष्यंत
 कुमार जी क़ी वो विलक्षण पंक्तियाँ समर्पित करना चाहता हूँ जो सम सामायिक है .......
                             " हो चली है पीर पर्वत सी पिघली चाहिए , अब हिमालय से भी इक गंगा निकालनी चाहिए
                                       तेरे सीने में नहीं तो मेरे सीने में सही,   तेरे सीने में नहीं तो मेरे सीने में सही, 
                                                  हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए 
                                                  सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
                                                            मेरी कोशिश है कि 
                                                         ये तस्वीर बदलनी चाहिए "

Friday, July 15, 2011

कौन से लोग हैं ये ?

वो सोचते हैं क़ी शायद ये पागल हैं, कभी कभी उन्हें लगता है क़ी इसमें कोई ना कोई छुपा फायदा तो इनका होगा ही ,फिर जब उनकी जिज्ञासाओं का कोई समाधान नहीं हो पता तो फिर अपना ध्यान दूसरी जगह लगा कर वो बचने लगते हैं उन जवाबों से जो उन्हें परेशान कर सकते हैं| पागलपन, जज्बा , राष्ट्र भक्ति चाहे किसी भी नाम से पुकार लो दिखने लगी है ये अब संस्कारधानी जबलपुर क़ी सड़कों पर | जिस संस्कारधानी को सारा राष्ट्र अपने राष्ट्र व्यापी आंदोलनों स्वाधीनता संग्राम के महत्वपूर्ण योगदान के लिए जनता था उसी संस्कारधानी क़ी छटा कुछ ख़राब कर दी है यहाँ क़ी भ्रष्ट होती राजनीती ने| हर दिन होते चक्का जाम , पुलिस से होती मुठभेड़, खून, दंगे जैसे हिस्सा बन गए हैं हमारे दैनिक जीवन का 

                                  इसी बीच एक आशा क़ी किरण सी कोंधी जब कुछ देश भक्तों ने ये संकल्प लिया क़ी अब बस बहुत हुआ हम कब तक यूँ ही इस निरंकुश शासन को कोस कर जीते रहेंगे, हम कब तक अपनी सुरक्षा , अपने हितों अपने वतन के लिए ज़िम्मेदार लोगों को हमारी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने देते रहेंगे फिर कोई अजमल कसब का इंतज़ार करेंगे हमारी संप्रभुता में  प्रश् चिन्ह लगाने के लिए ? हम यूँ ही शांत राह कर सहते रहेंगे कुछ राजा, कलमाड़ी , कनिमोझी, जैसे  नेताओं को जिन्हें राष्ट्र हित में कुछ भी करने से बेहतर अपना घर भरना लगता है?

हम तब भी शांत थे जब हम पे अग्रेजों ने शासन करने का इरादा किया था और हम आज भी शांत हैं; हम कल तब भी शांत थे जब हमारा देश दासता क़ी बेड़ियों में बांध रहा था और हम आज भी शांत हैं...दरअसल हमारी चुप्पी ही हमारी दुश्मन है| अब आप सोचे हमे किस का डर है आप का जीवन आप[ को ललकार रहा है धिक्कार रहा है इस स्वार्थ परक भावनाओं का नाश करने के लिए  | उठिए जागिये और समझने क़ी कोशिश कीजिये अपने राष्ट्र क़ी पुकार को , आपकी मात्र भूमि आपका आह्वान कर रही है ...

मैं जिन लोगों के बारे में बात कर रहा हूँ उन्होंने इस पुकार को ना केवल सुना है जबकि उसे गले से भी लगा लिया है दिन पे दिन कम होती रस्त्र्भक्तों क़ी संख्या को बढ़ने के लिए वो स्वप्रेरित हैं , देश के उत्थान के लिए भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए बीड़ा उठ लिया है चंद राष्ट्र भक्तों ने जबलपुर में |
 
                वो नेता नहीं हैं और ना ही कभी वो होना चाहते हैं वो आम जनता हैं जबलपुर क़ी जिन ने अपने रास्त्र के लिए खुद कुछ करने का संकल्प लिया है | आप उनके कार्यों को पेपर में बहुत ही कम पढेंगे क्यूंकि वो इसकी इच्छा ही नहीं रखते उनका समर्पण तो बस राष्ट्र के प्रति है वो दीवाने सुबह ५:१५ मिनिट पर उठ कर गली गली जाकर अलख जागते हैं राष्ट्र प्रेम क़ी शाम को वो लोगों तक इस जन आन्दोलन को पहुँचाने के लिए घर घर जाते है बस इस विश्वास के साथ क़ी कुछ हमारे जैसे लोग तो और होंगे इस महानगर में ; कभी मायूसी तो कभी कामयाबी पर ये लोग रुकते नहीं हैं ये थकते नहीं हैं बसे निःस्वार्थ रूप से लगे रहते हैं अपने राष्ट्र भक्ति के इस ज्वर को घर घर तक पहुँचाने में | 

             रुकिए रुकिए मुझे साफ़ करने दीजिये क़ी ये सभी लोग खाली और फालतू नहीं हैं ये आईना हमारे समाज का , इन में से कुछ सरकारी सेवा में हैं , कुछ वकालत में, कुछ प्राध्याप हैं, कुछ छात्र है तो कुछ उद्योगपति भी हैं , वे युवा हैं , वे प्रोढ़ हैं वे वो संकल्पित युवा हैं जिन्होंने अपनी राष्ट्र के प्रति ज़िम्मेदारी को  अपने दैनिक जीवक के कार्यों , अपनी दैनिक परेशानियों और अपने हालातों से कहीं ऊंचा स्थान दिया है|

दोस्तों आप को नहीं लगता क़ी अब आपको भी ऐसे लोगों के साथ होना चाहिए , क्या आपको नहीं लगता क़ी देश के प्रति अपना क़र्ज़ चुकाने का एक मौका आपको मिल रहा है और आप को इसे चुका देना चाहिए अगर आपके मन भी वही राष्ट्र भक्ति आपके रक्त में उबल रही है तो आइये और जुड़ जाइये राष्ट्र भक्तों के इस समूह में जिसे वे "इंडिया अगेंस्ट करप्शन" कहते हैं .........

अगर अभी नहीं तो कभी नहीं ............................... 

Wednesday, July 13, 2011

"जय हिंद"

आज अपने जीवन के उद्देश्यों  क़ी जीवन के मूल्यों और सिद्धांतो क़ी ताकत को देख कर अति प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूँ. जिस दिन से भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन का शंखनाद किया है सम्पूर्ण चिंतन निज परक ना होकर राष्ट्र वादी होने लगा है| पिछले कुछ दिन कुछ छोटी छोटी बातों के कारन बड़े उहा पोह के दिन थे किन्तु सिद्धांतों पर अडिकता ने आज अपने जीवन के उद्देशों के लिए संकल्पित और समर्पित होने के लिए प्रेरित किया. आज इंडिया अगेंस्ट कर्र्प्शन क़ी टोली ने अपनी कल क़ी महत्वपूर्ण बैठक में लिए एक सुझाव को अम्लीय जमा पहनाने का प्रयत्न किया जब आज सारी टोली निकल पड़ी घर घर में व्यक्तिगत रूप से मिल कर राष्ट्र प्रेम क़ी उसी भावना का संचार करने जिसकी आज हमारे राष्ट्र को ज़रुरत है. हर घर में पहले तो दरवाज़ों के अन्दर से झांकते डरे चहरे दीखते जो हम में या तो किसी नेता क़ी तस्वीर दुन्ढ़ते या फिर  किसी चंदा मांगने वाले क़ी ...लेकिन ऐसा कहते हैं ना क़ी अगर मन में पवित्रता और उद्देश्यों में दृढ़ता हो तो फिर आपको किसी तार्किक शक्ति क़ी ज़रूरत किसी को कुछ समझाने में नहीं लगती बस वैसे ही लोगों ने जैसे ही हमारे उद्देश्यों को सुना वो निकल आये घरों के बाहर बेख़ौफ़ होकर खुशी खुशी इस आन्दोलन में अपना योगदान देने.मनसा वाचा कर्मडा सारे ईमानदार राष्ट्र भक्तों को एक होते देर ना लगी और घर घर जाने का अथक प्रयास मिलने वाले सकारातम अनुभवों के आगे नत मस्तक हो गया| कही युवाओं क़ी टोली एक होकर हमारे समर्थन में भारत माता के जयघोष में जुट गयी कहीं अपने परिवार के लिए भोजन तैयार कर रहीं महिलाएं खाने क़ी चिंता छोड़ कर जुट गयीं अपना योगदान देने के विषय में जानकारी हासिल करने में| हम सभी भारत माँ के सच्चे सपूतों को तलाश करने में जुटे हैं और इस प्रकार का उत्साह वर्द्धक नतीजा हमें बहुत जल्दी ही अपने जैसे जुनूनी लोगों क़ी टोली इक्कठी कर देने में सहायक होगा | सच बहुत खुशी हुई अगर आप भी अपने जीवक के कुछ यादगार लम्हों को पाना चाहतें हैं तो आइये और जुड़ जाइये हमारे इस प्रयास से कल सुबह ५:१५ मिनिट पर कछपुरा ब्रिज के नीचे हनुमान मंदिर जबलपुर में.......जोर से चिल्लाने का मन कह रहा है 
"जय हिंद"