भ्रष्टाचार के काले पन्नों में एक और अध्याय जुड़ गया जब पुणे स्थित एक अत्यंत ही ज़िम्मेदार और महत्वपूर्ण संस्था "इण्डिया फोरेंसिक" ने ये खुलासा किया क़ी बीते दशक में १५५५ हज़ार करोड़ रूपए भ्रष्टाचार क़ी भेंट चढ़ गए हैं और भी ज्यादा परेशान करने वाला तथ्य ये क़ी इसमें से ज़्यादातर कमाई विदेश भेजी जा चुकी है | अपने आप में एक अनूठी रिपोर्ट "अस्सेस्तेर्निग साइज़ ऑफ़ करप्शन इन इण्डिया विथ रेस्पेक्ट तो मनी लौन्डरिंग" में बताया क़ी साल २००९ में प्रति व्यक्ति औसतन २००० रूपए क़ी घूस दी गई जो क़ी पिछले दस सालों में किसी नागरिक द्वारा इस मद में दी गई रकम का २६० गुना अधिक है | रिपोर्ट के मुताबिक बीते दशक में मनी लौन्डरिंग के तहत करीब १८८६ हज़ार करोड़ रूपए भारत से भेजे गए |
ऐसे कितने ही अध्याय भ्रष्टाचार के इस ग्रन्थ में अनवरत ही जुड़ते चले जायेंगे जब तक हम सभी स्वयं से इसका प्रतिकार नहीं करते| अपने कार्यों क़ी सुगमता को ध्यान में ना रख कर राष्ट्र हेतु कुछ प्रक्रियाओं कपालन में विश्वास नहीं रखते फिर वो चाहे बिना आरक्षण के रेल में यात्रा करना हो या फिर लाइसेंस बनाने के लिए बिना प्रक्रियाओं में बंधे लाइसेंस पाने का लालच | हम सभी अगर अंतिम शदों में कार्यों के निष्पादन से बचें तो अपने आप हम इन प्रक्रियाओं से हम बच सकते हैं | षडिक सहजता एवं सरलता कई बार हमें अनजाने में ही इस भ्रष्ट तंत्र का एक हिस्सा बना देती है. कहीं ना कहीं हम उसी तंत्र को मज़बूत करते जाते हैं जिसे हम नष्ट करने क़ी इच्छा रखते हैं |
मित्रों कई बार भ्रष्टाचार के इस तंत्र को ध्वस्त करने के प्रयास अनेक देश भक्तों ने किये हैं लेकिन हमारा मूक दर्शक बन कर उन्हें ताकते रहना अपने आप उनके प्रयासों को क्षीण करता गया है जिन राष्ट्र भक्तों को देश को सर माथे में बैठना चाहिए था वो राजनैतिक षड्यंत्रों के भंवर में फंसकर शहीद हो जाते हैं और सच कहूँ तो इसके लिए वो स्वार्थी भ्रष्ट नेता ज़िम्मेदार नहीं हैं, ज़िम्मेदार हैं आप , मैं और हम सब लोग जिन्होंने हमेशा मूक दर्शक बन कर राष्ट्र हित के इन प्रयासों को कमज़ोर किया है | हम जब कभी परेशान होते हैं बढ़ती हुई मंहगाई से हर दिन होते घोटालों से हम सिर्फ अपने ही द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों को कोसने क़ी सिवा कुछ नहीं करते | हमे मतदान के लिए जाना दुश्कर लगने लगता है और फिर जाली वोटों ,सच्चे नोटों और हमारे इस प्रसुप्त राष्ट्र वादिता से वही लोग संसद में पहुँचते हैं जिन्हें हम वहां नहीं देखना चाहते | हम कल भी चुप थे जब अंग्रेजों ने बाहर से आकर हमें गुलाम बना लिया था और हम आज भी चुप हैं | उस वक़्त भी हम उस मसीहा को ढूंढते थे जो हमें पराधीनता क़ी बेड़ियों से मुक्ति दिलाये और हम आज भी यही कर रहें हैं किन्तु पिछली बार जब हमें वो मसीहा मिले सारा हिंदुस्तान उसके साथ हो चला था फिर चाहे वो मसीहा बापू रहें हो , सुभाष चन्द्र बोस रहे हों या वो रहे हों भगत सिंह किन्तु जब इस बार हमें जोड़ने का ज़िम्मा कुछ राष्ट्र भक्तों ने उठाया है तो हम उनका साथ देने से बेहतर घर में बैठना पसंद करतें हैं | उन प्रखर राष्ट्र भक्तों को आपका सहयोग अपेक्षित है जिस से आप , मैं हम सब और हमारी आने वाली नस्लें उस गौरवशाली भारत को देख सकें जिसकी कल्पना हम रोज़ करतें हैं |
आइये हम राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को पहचाने और जुड़ें राष्ट्र प्रेम क़ी उस अविरल धारा में जिसे देश "इण्डिया अगेंस्ट करप्शन" के रूप में जान रहा है | जाते जाते आपको दुष्यंत
कुमार जी क़ी वो विलक्षण पंक्तियाँ समर्पित करना चाहता हूँ जो सम सामायिक है .......
" हो चली है पीर पर्वत सी पिघली चाहिए , अब हिमालय से भी इक गंगा निकालनी चाहिए
तेरे सीने में नहीं तो मेरे सीने में सही, तेरे सीने में नहीं तो मेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि
ये तस्वीर बदलनी चाहिए "
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