ज़िन्दगी में कभी कभी ऐसी घटनाएँ होती हैं जो आप के अंतर्मन को हिला कर रख देती है , ऐसी ही एक घटना से कल मेरा साक्षात्कार हुआ जब एक मुस्लिम महिला मुझ से अपने बेटे के इंजीनियरिंग के प्रवेश के लिए मिली . उनके घर में ४ सदस्य हैं माँ के अलावा जो पढाई कर रहें हैं. घर के सभी खर्चों के लिए आमदनी का जरिया माँ का गाँव - गाँव जाकर चूड़ियाँ बेचना बेटा साइकिल पकड़ कर आगे चलता है, माँ साइकिल के पीछे चूड़ियों का डिब्बा पकड़ कर कई किलोमीटर घुमने के बाद पूरे महीने पसीना बहाने के बाद वो बमुश्किल १५०० रूपए आजीविका कमाने के बाद भरण पोषण एक बड़ी समस्या है . वहीँ वो ईमानदार बच्चा अपनी माँ की मेहनत का प्रतिफल अपने १२ वी कक्षा में ८९% अंक और पी ई टी में ७९ अंक थे . पढने की अधम्य इच्छा माँ की मज़बूरी के आगे विवश थी, और शासन की एक बहुत अच्छी योजना उसके सपनो को साकार करने की ताकत दे रहे थे बस एक छोटी सी कागज़ी ज़रूरत के पूरा होने के देर थी वो भी बहुत छोटी सी ज़रूरत जाती प्रमाण पत्र बनाने की लेकिन आप इसे विधि का विधान कहेंगे या हमारे भाग्य विधाता बन चुके भ्रष्ट तंत्र की क्रूर परिणिति की जो अभागी माँ अपने पूरे परिवार का भरण पोषण हेतु दिन रात मेहनत करने के बाद पूरे साल में १८०००/- कमाती थी उस लाचार महिला से कार्य कराने की प्रेरणा राशि (जिसे हम आम जीवन में घूस के रूप में जानते हैं) के रूप में १००००/- रुपयों की मांग की और वो ममता का आँचल फैलाई माँ विवशता के आंसुओं को दिल में सहेजे कर अपने कई सालों की मेहनत जो उसने सहेज के रखी थी किसी बड़े कार्य के निष्पादन के लिए वो समर्पित कर आई हमारे शासकीय कार्यालय के भाग्यविधाता परमपूज्य शासकीय अधिकारीयों को
ये सब सुन कर मेरी आँखों में आंसू आ रहे थे पर उसके पहले मैं नमन करना चाहता था उन पाषाण ह्रदय महानुभावों का जिन के लिए ईमानदारी तो दूर की बात है तनिक संवेदना भी मानवीय मूल्यों के प्रति भी नहीं बची है.अगर कुछ इन के जीवन में अपरिहार्य है तो वो चढ़ावा जिसका मूल्य मानवीय मूल्यों से कहीं अधिक है..विडम्बना की जिस कार्यालय का उल्लेख मैं कर रहा हूँ वो इस देश में संस्कारधानी के नाम से विख्यात जबलपुर के जिलाधीश कार्यालय का ........क्या किसी को शर्मनाक से भी ज्यादा उचित शब्द इन के लिए समझ में आता है ???
Speak up friends we need to resist to these corrupt practices in the society.
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